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सरोकार  | 21.05.2009

एक हुआ जर्मनी

 

चार दशकों तक जर्मनी दो देशों में विभाजित रहा. एक ही कौम के दोनों देशों के बीच संबंध सोवियत रूस और अमेरिका के बीच टकराव का आईना था. लेकिन पश्चिम जर्मनी ने पूरब की ओर एक नई रणनीति अपनायी...

 

12 जून 1989-  पश्चिम जर्मनी के चांसलर हेल्मुट कोल मिख़ाइल गोर्बाचोव का कोलोन-बॉन हवाई अड्डे पर स्वागत करते हैं. स्वागत के लिए बिछाई गई लाल कालीन पर दोनों मिलकर रूस और पश्चिम जर्मनी के राष्ट्रीय गान गाते हैं. बाद में पता चलता है कि रूस के राष्ट्रपति गोर्बाचोव किसी साधारण काम के लिए नहीं आए हैं. अगले दिनों में जो कुछ भी होता है, वह दोनों देशों और दुनिया के इतिहास को बदल देता है. जर्मनी 1949 से 2009 तकBildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift:  जर्मनी 1949 से 2009 तक


किसानों और श्रमजीवियों का राष्ट्र

 पश्चिम जर्मनी की यात्रा के बाद गोर्बाचोव ने पूरब की ओर रुख किया. उनकी यात्रा का मक़सद था, पूर्वी जर्मनी के समाजवादी शासकों को बताना कि इस बदलाव वाले समय में समाजवाद को भी बदलना होगा. कोई भी देश इससे हटकर या बचकर नहीं रह सकता.

1949 में जब पूर्वी जर्मनी बना था, तो उस समय वहां के राष्ट्रपति विल्हेल्म पीक के मुताबिक "जर्मन भूमि पर पहली बार श्रमजीवियों और किसानों के एक राष्ट्र का गठन हुआ" था. जीडीआर के गठन के बाद कम्युनिस्ट पार्टी एसईडी वहां के लगभग एक करोड़ 70 लाख जर्मनों का भाग्य-विधाता बन गयी. जीडीआर मध्य यूरोप में तत्कालीन सोवियत संघ का गढ़ बन गया और बर्लिन शहर पूर्वी और पश्चिमी भागों में बंट गया.

सोवियत संघ के तत्कालीन शासक स्टालिन को साम्यवाद का सिरमौर मानते हुए पूर्वी जर्मन कम्युनिस्ट पार्टी के उस समय के एक नेता एरिश हॉनेकर ने कहा था- "विश्व में शांति और प्रगति का झंडा फहराने वाले को सलाम! जर्मन जनता का सबसे अच्छा दोस्त-- जोसेफ इसारियानोविच स्टालिन".

पूर्वी-पश्चिमी जर्मनी मे हुए बड़े प्रदर्शनBildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift:  पूर्वी-पश्चिमी जर्मनी मे हुए बड़े प्रदर्शनएरिश होनेकर उस समय जीडीआर के युवा संगठन "फ्री जर्मन यूथ" यानी स्वतंत्र जर्मन युवा संघ के प्रमुख थे. लेकिन ढेरों कोशिशों के बाद भी जीडीआर की जनता साम्यवादी शासन से धीरे-धारे निराश होने लगी थी. 1953 के जून के महीने में मज़दूरों का एक प्रदर्शन हुआ. सरकार ने उसे बेरहमी से दबाने की कोशिश की, हालांकि एक समाजवादी राष्ट्र के निर्माण में एसईडी कोई भी कसर बाकी नहीं रखना चाहती थी. जैसा कि पार्टी- पोलिटब्यूरो के एक सदस्य ने कहा, "जीडीआर इतिहास के मंच पर उतर चुका है और अब वह वहां से पीछे नहीं हटेगा. वह दिन दूर नहीं है, जब पूरा जर्मनी एक बड़ा लोकतंत्र होगा."

लेकिन, इस दौरान पश्चिम जर्मनी, इन समाजवादी आदर्शों से दूर, एक बिल्कुल अलग रूप ले रहा था. पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी दूसरे विश्व युद्ध के विजेताओं के लिए उनकी परस्पर विरोधी विचारधाराओं को आजमाने की परीक्षण भूमि बन गये थे. दोनों जर्मन देश अपने-अपने ढंग से अपने सोवियत औऱ अमेरिकी मित्रों को खुश रखना चाहते थे.

एक शहर का विभाजन

1949 से ले कर 1961 तक  जीडीआर से लगभग 2000 लोग हर रोज़ सीमा पार कर पश्चिम में बसने के लिए पलायन कर रहे थे, मतलब 11 साल में 2 करोड़ से ज़्यादा लोग पलायन कर गये. कुछ तो पश्चिम में नौकरी-धंधे के बेहतर अवसरों के कारण और कुछ जीडीआर की विचारधारा से निराश होकर वहां के इंजीनियर, डॉक्टर और शिक्षक, सभी देश छोड़कर जाने लगे.

जीडीआर के परेशान शासकों ने लोगों को रोकने की कोशिश में बर्लिन के बीचोबीच दीवार खड़ी करने का फैसला किया. रातोंरात यह ऐतिहासिक शहर दो भागों में बंट गया. कई घरों और गलियों के बीच में दीवार खड़ी हो गई. पहले के पड़ोसी अब दो अलग-अलग देशों में रहने लगे.

एक रिपोर्टर अपने अनुभव बताता है-" मैं फुटपाथ पर नहीं चढ़ सकता, क्योंकि अब वह पूर्वी जर्मनी का हिस्सा है. कोई 200-250 मीटर दूर मैने देखा कि एक गड़ढ़ा खोदा जा रहा था. पूरब की पुलिस, वहां के दमकल कर्मी  यूनिफॉर्म पहने खड़े थे. मशीनों से गड़्ढ़े खोदते हुए वे मेरी तरफ देख रहे थे और हंस भी रहे थे. उनके चेहरों से ऐसा लग रहा था, जैसे कह रहे हों--यह आवाज़ बस इसलिए है, ताकि तुम इसे अच्छी तरह अपने माइक से रिकॉर्ड कर सको."

बर्लिन की लंबी दीवार ने 28 वर्षों तक शहर को बांटे रखा. कई लोगों की नौकरियां चली गईं.  कोई 1000 लोग पूर्वी हिस्से से पश्चिम की ओर भागने के प्रयास में दीवार फांदते हुए मारे गए. दीवार के बनने के बाद भी जीडीआर में सीमा को लेकर विवाद चलता रहा. 1963 में एक क़ानून पास किया गया, जिसके मुताबिक जनता अपने पश्चिमी रिश्तेदारों से मिलने के लिए जीडीआर सरकार की अनुमति ले सकती थी. इसका लाभ उठा कर बाद में क़रीब दस लाख लोग पूर्वी जर्मनी छोड़कर पश्चिम में अपने रिश्तेदारों के साथ बस गए.

ओस्टपोलिटीक

1970 वाले दशक में पश्चिम जर्मनी के नेता विलि ब्रांट ने दोनों देशों के बीच मेलजोल बढ़ाने की नीति चलायी. उनका मानना था कि अगर जर्मनी दो देशों में बंटा हुआ है, तो इससे लोग एक दूसरे के लिए पराये नहीं हो जाते, उनका संबंध एक अलग तरीके का संबंध हो सकता है. विली ब्रांट की नई "ओस्टपोलिटीक" या पूर्वी नीति उनकी सरकार की रणनीति का हिस्सा बन गयी.

पहली बार जर्मनी-और-जर्मनी के बीच संबंधों पर ज़ोर दिया गया और ब्रांट पश्चिम से पूर्वी जर्मनी जाने वाले पहले चांसलर बने. पूर्वी जर्मन शहर एरफुर्ट में उनका ज़ोरदार स्वागत हुआ. दोनों देशों ने अपनी तरफ से राजदूतों के बदले "स्थायी प्रतिनिधि" भेजने का वादा किया. तब भी, 1970 के दशक में संबंध सामान्य नहीं हो पाये.

1985 में जब गोर्बाचोव ने तत्कालीन सोवियत संघ का शासन संभाला, तो बदलाव की जैसे आंधी-सी चल पड़ी, जिसने पश्चिमी यूरोप और सोवियत गुट वाले देशों के बीच के बीच की लौह-दीवार (आयरन कर्टन) को हमेशा के लिए गिरा दिया और इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत की.

दी माउअर मुस वेग

1989 के आते-आते पूर्वी जर्मनी के लोग अपने यहां की राजनीतिक स्थिति से पूरी तरह निराश हो गये थे. बर्लिन दीवार के पश्चिमी हिस्से में एक रॉक ग्रुप "यूरिदमिक्स" ने अपने गीतों का एक कॉंन्सर्ट आयोजित किया. पूर्वी हिस्से के लोग जब दीवार के पास आकर सुनने लगे तो पुलिस उन्हें वापस भेजने लगी. भावुक होकर लोगों ने फिर नारे लगाने शुरु किए-- दी माउअर मुस वेग-- इस दीवार को हटाना होगा.

जीडीआर की सरकार जनता की आवाज़ को नकार कर 1989 में अपने गठन की 40वीं सालगिरह मना रही थी. उधर पूर्वी जर्मनी से हंगरी छुट्टी मनाने गए लोगों ने वापस आने से मना कर दिया और बुडापेस्ट में पश्चिम जर्मनी के दूतावास में शरण लेने लगे. पश्चिम जर्मन कानून के अनुसार 1937 के बाद जर्मन भूमि पर पैदा हुए हर व्याक्ति को जर्मन माना जाता है. इसके मुताबिक पूर्वी जर्मनी के सारे लोग भी पश्चिम के नागरिक थे.

पश्चिम जर्मनी के दूतावास में पूर्वी जर्मनों के शरण लेने और पूर्वी जर्मन सरकार पर दबाव बढ़ने की ख़बर का पश्चिमी मीडिया में ज़बरदस्त स्वागत हुआ. कुछ ही दिनों बाद दीवार भी तोड़ दी गई.


आलेख- मथियास फ़ॉन नोए हेलफ़ेल्ड / मानसी गोपालकृष्णन

संपादन- राम यादव

 

Jochen Vock

 

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